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Israel Stops Gaza Aid Flotilla: इजरायली सेना ने बुधवार को गाजा जा रही विदेशी एक्टिविस्ट और राहत सामग्री से भरी नौकाओं को रोक दिया. इन नावों पर दवाइयां और खाना ले जाया जा रहा था, जिन्हें गाजा में भेजने का दावा किया जा रहा था. कार्रवाई के बाद सभी नौकाओं को इजरायल के एक बंदरगाह पर ले जाया गया.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक वीडियो में साफ दिख रहा है कि स्वीडन की मशहूर जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग नौका के डेक पर बैठी थीं और उनके चारों ओर सैनिक मौजूद थे. इजरायल ने इस कार्रवाई के दौरान हामास से जुड़े पाकिस्तानी पूर्व सांसद मुश्ताक अहमद खान को भी हिरासत में लिया है. बताया जा रहा है कि फ्लोटिला में 37 देशों के 200 से अधिक लोग सवार थे, जिन्हें अब इजरायली बलों ने हिरासत में ले लिया है.
इजरायल का बयान
इजरायल के विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर बयान जारी करते हुए कहा, “हमास-सुमूद फ्लोटिला की कई नौकाओं को सुरक्षित रूप से रोका गया है और उनके यात्रियों को बंदरगाह लाया गया है. ग्रेटा थनबर्ग और उनके सभी साथी सुरक्षित हैं और स्वस्थ हैं.”
यह पूरा अभियान ‘ग्लोबल सुमूद फ्लोटिला’ (Global Sumud Flotilla) नाम से चलाया जा रहा था. इसमें करीब 40 से अधिक नागरिक नौकाएं शामिल थीं और इनमें 500 सांसद, वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता सवार थे. इनका दावा था कि उनका मिशन पूरी तरह ‘अहिंसक और मानवीय’ था. फ्लोटिला ने टेलीग्राम पर कई वीडियो भी साझा किए, जिनमें यात्री अपने पासपोर्ट दिखाकर बता रहे थे कि उन्हें जबरन इजरायल लाया जा रहा है.
तुर्की ने बताया ‘हमला’
इजरायल की इस कार्रवाई पर कई देशों ने नाराजगी जताई है. खासतौर पर तुर्की ने इस कदम को ‘हमला’ और ‘आतंकी कृत्य’ बताया. तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस कार्रवाई ने निर्दोष नागरिकों की जान को खतरे में डाल दिया है. इसी बीच, स्पेन और इटली ने भी अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए नौकाएं और ड्रोन भेजे थे ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें मदद मिल सके. इटली में तो इस घटना के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन भी भड़क उठे.
नाकाबंदी का विरोध
गाजा की नाकाबंदी के खिलाफ यह अभियान दुनिया भर में चर्चा का विषय बन चुका था. भूमध्य सागर के रास्ते गाजा की ओर बढ़ रहा यह फ्लोटिला पहले ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींच चुका था. लेकिन इजरायल ने साफ कर दिया था कि वह इन नावों को आगे बढ़ने की इजाजत नहीं देगा.
दिल्ली में कफ सिरप को लेकर डर
दिल्ली में बीते कुछ दिनों में बच्चों की मौत के मामलों के बाद कफ सिरप को लेकर डर का माहौल बन गया है. एक तरफ अभिभावक किसी भी सिरप को देने से हिचक रहे हैं, वहीं डॉक्टर भी अब खांसी-जुकाम के लिए दवाओं के चयन में बेहद सतर्क हो गए हैं. दवा बाजार में इसका असर साफ दिख रहा है. कई दवा दुकानों पर कफ सिरप की बिक्री 30 से 40 प्रतिशत तक घट चुकी है.
मध्य प्रदेश, राजस्थान, सहित कई राज्यों में कफ सिरप के इस्तेमाल से बच्चों की मौत के बाद राजधानी दिल्ली में भी इसका असर तेजी से देखने को मिल रहा है. दवा कारोबारियों के मुताबिक सिरप की मांग में 30 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई है. लोग अब सिरप खरीदने से पहले कई बार सोच रहे हैं. वहीं डॉक्टर भी इसे लिखने से परहेज कर रहे हैं.
दवा कारोबारियों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में कफ सिरप की बिक्री में 30 प्रतिशत से भी ज्यादा की कमी आई है. पहले जहां लोग बेझिझक बेनाड्रिल जैसे कफ सिरप की मांग करते थे, अब वे इसकी जगह गोली और कैप्सूल लेना ज्यादा पसंद कर रहे हैं. लोगों में डर इस हद तक है कि वे बच्चों के लिए भी सिरप लेने से झिझक रहे हैं.
घरेलू नुस्खों को दे रहे प्राथमिकता
डर का आलम सिर्फ दवा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की सोच पर भी गहरा असर डाल रही है. कई माता-पिता अब बच्चों को कफ सिरप देने से बच रहे हैं. उनका कहना है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में बच्चों की मौत की खबर सुनने के बाद उनके मन में सिरप को लेकर खौफ बैठ गया है. यही कारण है कि अब वे हर्बल उपचार और घरेलू नुस्खों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं.
डॉक्टरों बरत रहे हैं सतर्कता
कफ सिरप घटना के बाद अब डॉक्टरों के नजरिए में भी बदलाव आया है. कफ सिरप लिखते समय अब वे काफी सतर्कता बरत रहे हैं. वहीं दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर पंकज सिंह ने भी इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाते हुए कहा कि जो गाइडलाइंस इस कफ सिरप को लेकर केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई है, वहीं दिल्ली में भी लागू रहेगी और सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी इस दवा को न बेचे न खरीदें और न इस्तेमाल करें.
लोगों का भरोसा टूटा
मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत की घटना के बाद अब दिल्ली में कफ सिरप को लेकर लोगों का भरोसा हिल गया है. जहां दवा बाजार में बिक्री में भारी गिरावट आई है, वहीं डॉक्टर और आम लोग दोनों ही अब किसी भी प्रकार की लापरवाही से बच रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग की नजर भी इस पूरे मामले पर बनी हुई है.
नेपाली सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल
Nepal Political Crisis: नेपाल में पिछले कुछ दिनों से चल रही उथल-पुथल ने गंभीर रूप ले लिया है. सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब पूरे देश में हिंसक रूप ले चुका है. राजधानी काठमांडू सहित कई प्रमुख शहरों में सार्वजनिक और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया. इस तनावपूर्ण स्थिति के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार (9 सितंबर) को इस्तीफा दे दिया.
देश में प्रशासनिक संकट और बढ़ती हिंसा को देखते हुए सेना ने स्थिति नियंत्रण में लेने की जिम्मेदारी संभाल ली है. सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने रात को राष्ट्र को संबोधित कर प्रदर्शनकारियों से अपील की कि वे हिंसा और तोड़फोड़ रोककर शांति की दिशा में आगे बढ़ें. उन्होंने कहा, "हम प्रदर्शनकारी समूह से अनुरोध करते हैं कि वे अपने कार्यक्रम स्थगित करें और संवाद के जरिए समाधान खोजें. हमें राष्ट्र की ऐतिहासिक धरोहरों, सार्वजनिक और निजी संपत्ति की रक्षा करनी है. आम नागरिकों और विदेशी मिशनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है."
सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने साफ चेतावनी दी कि लूटपाट, आगजनी और हिंसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. सेना ने राजधानी काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और सरकारी सचिवालय सिंहदरबार को अपने नियंत्रण में ले लिया है. कई मंत्रियों और पूर्व प्रधानमंत्रियों के आवासों पर हमलों के बाद सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत कर दी गई है. जनरल अशोक राज सिग्देल, जो पिछले साल नेपाल सेना के प्रमुख बने थे, संकट की इस घड़ी में देश को स्थिरता की दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं.
हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, जनरल अशोक राज सिग्देल का शुमार भारत और चीन दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन यह हालात उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं. नेपाल में यह संकट दर्शाता है कि सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के आरोप किस तरह व्यापक असंतोष के कारण बन गये. अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि बातचीत और संयम के रास्ते पर लौटकर देश में शांति बहाल की जा सके. सेना की भूमिका फिलहाल निर्णायक मानी जा रही है.
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France Nationwide Strike: फ्रांस में गुरुवार को बड़े पैमाने पर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन हुए. इन प्रदर्शनों की सबसे बड़ी वजह सरकार की खर्चों में कटौती की योजना है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार गरीब और मध्यम वर्ग की जरूरतों की अनदेखी कर रही है, जबकि अमीर वर्ग से अधिक टैक्स वसूल कर इन योजनाओं को बचाया जा सकता है.
यह हड़ताल फ्रांस की प्रमुख यूनियनों द्वारा बुलाई गई थी. पेरिस सहित देश के 200 से ज्यादा शहरों और कस्बों में हजारों कामगार, पेंशनभोगी और छात्र सड़कों पर उतर आए. राजधानी पेरिस में प्रदर्शनकारियों ने "प्लेस द’इटली" से मार्च की शुरुआत की. इस दौरान प्रसिद्ध पर्यटक स्थल आइफल टॉवर को भी बंद करना पड़ा.
यूनियनों का आरोप है कि सरकार का खर्चों में कटौती का प्रस्ताव सीधे तौर पर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर असर डालेगा. इनमें स्वास्थ्य, पेंशन और शिक्षा जैसी योजनाएं शामिल हैं. यूनियनों ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा हुआ तो आम लोगों की क्रयशक्ति और कमजोर होगी, जिससे आर्थिक असमानता और बढ़ जाएगी. उनका कहना है कि इन योजनाओं को बचाने के लिए सरकार को अमीरों पर टैक्स बढ़ाना चाहिए.
गौरतलब है कि पिछले महीने ही सेबास्टियन लेकोर्नू फ्रांस के नए प्रधानमंत्री बने हैं. उन्होंने अब तक अपने बजट की पूरी जानकारी या मंत्रिमंडल की सूची जारी नहीं की है. उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में उनकी सरकार का गठन होगा और साल के अंत तक संसद में बजट पर बहस होगी. इन प्रदर्शनों ने साफ कर दिया है कि सरकार को बजट पेश करने से पहले आम जनता और यूनियनों की नाराजगी का सामना करना होगा. फिलहाल फ्रांस में यह राजनीतिक और सामाजिक बहस का अहम मुद्दा बना हुआ है.