सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
Supreme Court on Dilsukhnagar Bomb Blast Accused: हैदराबाद के 2013 दिलसुखनगर डबल बम धमाका मामले में दोषी करार दिए गए असदुल्लाह अख्तर की फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (25 सितंबर) को रोक लगा दी है. इन धमाकों में 18 लोगों की मौत हुई थी और 131 लोग घायल हुए थे.
असदुल्लाह अख्तर को साल 2016 में एनआईए की विशेष अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी, जिसे तेलंगाना हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल 2024 को बरकरार रखा था. इसके बाद अख्तर ने 20 सितंबर को हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की थी.
तीन जजों की बेंच ने सुना मामला
गुरुवार को जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की तीन सदस्यीय बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की. अख्तर की वकील सीमा मिश्रा ने अदालत को बताया कि वह फिलहाल दिल्ली की मंडोली जेल में बंद है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि जो भी आदेश दिए जाएं, उसकी जानकारी सीधे जेल प्रशासन तक पहुंचे. वकील ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी गुज़ारिश की कि एसएलपी दाखिल करने में हुई 75 दिन की देरी को माफ किया जाए, जिसे अदालत ने मंज़ूर कर लिया.
कोर्ट ने मांगी तीन रिपोर्टें
बेंच ने न सिर्फ फांसी की सजा पर रोक लगाई बल्कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट की मूल फाइलें मंगाने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को कहा गया कि इन रिकॉर्ड्स की अनुवादित कॉपियां सभी पक्षकारों को उपलब्ध कराई जाएं. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि जेल में अख्तर के व्यवहार और मानसिक स्थिति की विस्तृत जांच की जाए. इसके लिए अदालत ने आठ हफ्तों के भीतर तीन रिपोर्टें पेश करने को कहा है.
इनमें एक रिपोर्ट प्रोबेशन अधिकारी द्वारा होगी, जो दोषी के व्यवहार पर नज़र रखने के बाद तैयार की जाएगी. दूसरी रिपोर्ट जेल अधीक्षक की होगी, जिसमें जेल के अंदर अख्तर की गतिविधियों और आचरण का ब्यौरा होगा. तीसरी रिपोर्ट उसके मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी होगी, जिसमें उसकी मानसिक स्थिति का आंकलन किया जाएगा. कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि ये आदेश तुरंत दिल्ली सरकार के स्थायी वकील को भेजे जाएं और वे सुनिश्चित करें कि जेल प्रशासन तक आदेश पहुंचे और उसका पालन हो.
12 हफ्ते बाद होगी अगली सुनवाई
अदालत ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 12 हफ्ते बाद होगी. तब तक सभी रिकॉर्ड्स और रिपोर्टें कोर्ट में पेश होनी चाहिए. साथ ही अख्तर की लीगल टीम को दो हफ्ते के भीतर दायर याचिका में पाई गई कमियों को दुरुस्त करने का निर्देश भी दिया गया है.
गौरतलब है कि 21 फरवरी 2013 को हुए दिलसुखनगर बम धमाका हैदराबाद के हालिया इतिहास के सबसे भयावह आतंकी हमलों में से एक था. एनआईए की जांच और सबूतों के आधार पर विशेष अदालत ने 13 दिसंबर 2016 को असदुल्लाह अख्तर को मौत की सजा सुनाई थी. इस फैसले को इस साल तेलंगाना हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था, जिसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है.
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तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार
बिहार की सियासत अब घोषणापत्र की लड़ाई में उतर चुकी है. एनडीए और महागठबंधन, दोनों ने जनता के सामने अपनी विकास-दृष्टि पेश की है. रोजगार और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर दोनों गठबंधन समान रूप से सक्रिय दिखे, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग के क्षेत्र में उनकी प्राथमिकताएं अलग-अलग नजर आती हैं. सवाल यह है कि बिहार की जनता किस मॉडल पर भरोसा करेगी - एनडीए के ‘विकसित बिहार’ के एजेंडे पर या महागठबंधन के ‘न्याय-विकास’ के विज़न पर?
NDA के मजबूत पहलू
1. रोजगार लक्ष्य: एनडीए ने 1 करोड़ नौकरियों का वादा किया है.
2. विशेष वर्गों को केंद्रित: महिलाओं, दलितों, अति-पिछड़ों को आर्थिक-सहायता का वादा भी एनडीए के घोषणा पत्र में शामिल है.
3. इन्फ्रास्ट्रक्चर और औद्योगीकरण पर जोर: राज्य में बड़े निवेश, एक्सप्रेसवे, रेल आधुनिकीकरण का वादा, बाढ़ मुक्त बिहार, फ्री एजुकेशन और चिकित्सा सुविधा.
4. योजनाओं पर अमल पर बल: कौशल-विकास केन्द्र, जिले-स्तर पर मेगा स्किल सेंटर आदि का प्रावधान.
5. दीर्घावधि विकास का मिशन-सेट: 'विकसित बिहार' जैसे विजन के साथ योजनाओं विकास का वादा.
Mahagathbandhan के सकारात्मक पहलू
1. हर-घर सरकारी नौकरी का वादा: प्रत्येक परिवार में एक सरकारी नौकरी देने का वादा.
2. सामाजिक सुरक्षा : पुरानी पेंशन योजना बहाल करने के साथ्ज्ञ महिलाओं-विधवाओं के लिए मासिक सहायता राशि की योजना पर अमल का वादा.
3. शिक्षा-प्रौद्योगिकी और सुधार पर जोर: छात्र-छात्राओं के लिए मुफ्त फॉर्म-एग्जाम फीस, टेबलेट, बड़े-स्तर की यूनिवर्सिटी-कॉलेज.
4. न्याय-वितरण और सुधारात्मक दृष्टि: माइक्रो-फाइनेंस कंपनियों पर सख्ती, भूमि-मुक्का रहितों को जमीन देने का वादा.
5. राष्ट्रवाद-विकास को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ने की कोशिश: घोषणापत्र में सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यक-वर्ग, किसान-वर्ग के हितों पर फोकस किया गया.
एनडीए vs महागठबंधन
1. रोजगार का वादा: संख्या बनाम नीति
एनडीए ने 1 करोड़ नौकरियों का ठोस लक्ष्य तय किया है. रोजगार सृजन के मद्देनजर निजी क्षेत्र और MSME पर फोकस किया जाएगा. जबकि महागठबंधन ने हर घर से एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया है, लेकिन उस पर अमल कैसे होगा यह स्पष्ट नहीं है.
2. विकास बनाम कल्याण
एनडीए के घोषणा पत्र में उद्योग, IT पार्क, सड़क और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने का रोडमैप दिया गया है. महागठबंधन ने सामाजिक सुरक्षा, पेंशन बहाली, महिलाओं को मासिक सहायता पर जोर दिया है.
3. महिलाओं और युवाओं के लिए योजनाएं
एनडीए ने महिला सुरक्षा और स्वरोजगार योजना चलाने के लिए स्किल सेंटर और शिक्षा में निवेश की वकालत की है. महागठबंधन के घोषणा पत्र में महिला सहायता राशि, छात्राओं को टैबलेट और मुफ्त फॉर्म-फीस का वादा.
4. किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
एनडीए ने कृषि-उद्योग, फूड प्रोसेसिंग और सिंचाई नेटवर्क के विस्तार पर ध्यान दिया है. वहीं महागठबंधन ने किसानों की कर्जमाफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया है.
5. विश्वसनीयता
एनडीए ने नीतियों के साथ रोडमैप भी पेश किया है. यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के वादों में शासन प्रशासन के अनुभव की झलक दिखाई देती है. दूसरी ओर महागठबंधन के वादों में भावनात्मक अपील ज्यादा है. वित्तीय योजनाओं की नीति साफ नहीं है.
बेहतर कौन?
बड़ी योजनाओं पर अमल के लिहाज से देखें तो एनडीए का मेनिफेस्टो बेहतर दिखता है. क्योंकि उसमें रोजगार, निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे ठोस वादे हैं, जिन्हें मापने-योग्य बनाया गया है.लेकिन यदि 'सामाजिक न्याय, समावेश-उपरांत सुधार, जोखिम-रहित वादे' देखें तो महागठबंधन का मेनिफेस्टो ज्यादा आकर्षक लगता है. खासकर उन लोगों के लिए जो पेंशन, शिक्षा-सुधार और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं. एनडीए का वादा अधिक व्यावहारिक और स्किल-आधारित दिखता है.
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर चुनाव प्रचार चरम पर है. अब दोनों प्रमुख गठबंधन का घोषणा पत्र भी सामने आ गए है. विधानसभा की 121 सीटों पर पहले चरण का चुनाव प्रचार अंतिम चरण में है. सभी दलों के नेता और प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर स्तर पर जोर आजमाइश में जुटे हैं. पहले चरण के लिए मतदान 6 नवंबर और दूसरे चरण का मतदान 11 नवंबर को होगा. 243 सीटों पर डाले गए मतों की गिनती 14 नवंबर को होना है. मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए जाएंगे.
सीजेआई बीआर गवई
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में पूर्व जज सुरेश्वर ठाकुर थे. उनके कई फैसले सुप्रीम कोर्ट में अपील किए गए थे. उनकी भाषा और तर्क शैली को न्यायिक विशेषज्ञों और वकीलों ने समझने में कठिन माना था. सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा कि वह, “हर वह फैसला जिसे ठाकुर जज के द्वारा दिया गया था और जो सुप्रीम कोर्ट में चुनौती बनकर आया, उसे पलट दिया है.
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बी.आर. गवई ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक विवादास्पद टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने पूर्व पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट जज सुरेश्वर ठाकुर के फैसलों को केंद्र में रखा. गवई ने कहा कि ठाकुर के निर्णय ‘बहुत अस्पष्ट’ थे और उनकी भाषा इतनी जटिल थी कि सुप्रीम कोर्ट को उन्हें समझने में कठिनाइयां हुईं. उस बेंच की सुनवाई के दौरान उन्होंने यह भी खुलासा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दिए गए लगभग सभी फैसलों को पलट दिया. इस पर उन्होंनं गहरा खेद भी व्यक्त किया, यह कहते हुए, “सौभाग्य है कि वे रिटायर हो गए.”
यह बयान न्यायपालिका में समीक्षा, जवाबदेही और फैसला देने की गुणवत्ता पर एक अहम बहस को फिर से हवा दे रहा है. पूर्व जज सुरेश्वर ठाकुर, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में थे। उनके कई फैसले सुप्रीम कोर्ट में अपील किए गए थे. उनकी भाषा और तर्क शैली को न्यायिक विशेषज्ञों और वकीलों ने “समझने में कठिन” माना था.
CJI गवई का बयान
सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा कि “हर वह फैसला जिसे ठाकुर जज के द्वारा दिया गया था और जो सुप्रीम कोर्ट में चुनौती बनकर आया, उसे पलटा गया.” उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों को उन फैसलों को डिकोड (decode) करने में “बहुत कठिन समय” लगा. सौभाग्य है कि उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया. यह उनकी बात न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाती है.
न्यायिक चिंताएं
विशेषज्ञों का कहना है कि ठाकुर के फैसलों की अस्पष्ट भाषा न सिर्फ कानूनी व्याख्या को मुश्किल बनाती थी, बल्कि न्यायिक समीक्षा प्रक्रिया में समय और संसाधन की बर्बादी भी हुई. यह मामला जजों की जवाबदेही, न्याय की गुणवत्ता और फैसलों की स्पष्टता जैसी बड़ी समृद्ध न्यायिक चुनौतियों को सामने लाता है.
कुछ का तर्क है कि जटिल और अस्पष्ट निर्णय न्याय पाने वालों के लिए परेशानियाँ बढ़ाते हैं, क्योंकि पुनरीक्षण या अपील की जरुरत पड़ती है, जिससे न्याय प्रक्रिया लंबी और महंगी हो सकती है.
अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की
भारत आए अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी का दौरा अब धार्मिक और सांस्कृतिक आयाम भी लेने जा रहा है.वह शनिवार (11 अक्टूबर, 2025) को विश्वविख्यात इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद पहुंचेंगे, जहां उनका भव्य स्वागत किया जाएगा. दौरे के दौरान वे मदरसे के शैक्षणिक और धार्मिक ढांचे को करीब से समझेंगे और भारतीय उलेमा से संवाद करेंगे. मुतक्की देवबंद के दारुल उलूम पहुंचकर मौलाना अरशद मदनी से मुलाकात करेंगे. इस मुलाकात को दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
कार्यक्रम दो चरणों में विभाजित किया गया है. पहले चरण में सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक मुत्तकी दारुल उलूम परिसर का भ्रमण करेंगे. इस दौरान वे शिक्षकों से मुलाकात करेंगे और संस्था के वरिष्ठ शिक्षक व जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी से भी विशेष भेंट करेंगे.
मदरसे की लाइब्रेरी में होगा कार्यक्रम
इसके बाद लंच का आयोजन होगा, जिसमें दारुल उलूम के प्रमुख मौलवियों के साथ-साथ अफगान प्रतिनिधिमंडल के सदस्य भी शामिल होंगे. कार्यक्रम का दूसरा चरण दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक मदरसे की लाइब्रेरी में आयोजित किया जाएगा. इस सत्र में मुतक्की दारुल उलूम की कक्षाओं का दौरा करेंगे और कुरान और हदीस पढ़ाने की परंपरागत शैली का अवलोकन करेंगे.
इसके साथ ही वह एक कक्षा में बैठकर छात्रों की पढ़ाई की व्यवस्था को भी देखेंगे. लाइब्रेरी में आयोजित विशेष सभा में दारुल उलूम और आसपास के अन्य मदरसों से आए उलेमा और शिक्षक शामिल होंगे. इस सभा को पहले मौलाना अरशद मदनी संबोधित करेंगे, जिनका भाषण लगभग 30 मिनट का होगा.
सांस्कृतिक रिश्तों पर करेंगे बात
इसके बाद अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की भी सभा को संबोधित करेंगे और अफगानिस्तान में इस्लामी शिक्षा व्यवस्था, मदरसों की भूमिका और भारत-अफगान सांस्कृतिक रिश्तों पर अपनी बात रखेंगे.
दारुल उलूम प्रबंधन के अनुसार, इस कार्यक्रम में देवबंद और आसपास के 40 से अधिक मदरसों के मौलवियों को आमंत्रित किया गया है. यह दौरा भारत-अफगानिस्तान के धार्मिक और शैक्षिक रिश्तों को एक नई दिशा देने की पहल माना जा रहा है.