(प्रतीकात्मक तस्वीर)
India America Trade Deal: भारतीय शेयर बाजार के लिए आगामी सप्ताह काफी अहम रहने वाला है. बाजार की दिशा अमेरिका में ब्याज दरों में संभावित कटौती, भारत-अमेरिका और भारत-ईयू ट्रेड डील, और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की चाल से तय होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक में ब्याज दरों में 25 आधार अंक की कटौती की संभावना है.
हालांकि, अगर दरों में 50 आधार अंक की कटौती होती है तो यह बाजार के लिए एक बड़ा सरप्राइज़ होगा, जिससे अमेरिकी बाजारों में मजबूती आ सकती है और इसका सकारात्मक असर वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है. भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत जारी है. केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में बताया था कि पहला चरण नवंबर तक अंतिम रूप ले सकता है.
वहीं, भारत-यूरोपियन यूनियन व्यापार समझौते पर भी बातचीत एडवांस चरण में पहुंच चुकी है. दोनों व्यापार सौदे भारतीय शेयर बाजार के लिए बड़े ट्रिगर बन सकते हैं, क्योंकि ये निवेश और निर्यात को गति देने में मदद करेंगे. इसके अलावा एफआईआई की चाल भी बाजार के लिए निर्णायक होगी. पिछले पांच कारोबारी सत्रों में एफआईआई ने दो सत्रों में खरीदारी की. शुक्रवार को विदेशी निवेशकों ने 129.58 करोड़ रुपये का निवेश किया, जो संकेत देता है कि एफआईआई का रुझान धीरे-धीरे सकारात्मक हो रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो घरेलू बाजारों को अच्छा समर्थन मिल सकता है. बीते सप्ताह भारतीय शेयर बाजार ने शानदार प्रदर्शन किया. निफ्टी 373 अंक यानी 1.51 प्रतिशत की बढ़त के साथ 25,114 पर बंद हुआ. वहीं, सेंसेक्स 1,193.94 अंक यानी 1.48 प्रतिशत बढ़कर 81,904.70 पर पहुंच गया. 8 से 12 सितंबर के बीच अधिकांश सेक्टर ने सकारात्मक रिटर्न दिया. निफ्टी ऑटो में 2.07 प्रतिशत, निफ्टी आईटी में 4.26 प्रतिशत, निफ्टी पीएसयू बैंक में 2.94 प्रतिशत, निफ्टी पीएसई में 2.70 प्रतिशत, निफ्टी हेल्थकेयर में 1.79 प्रतिशत और निफ्टी इंडिया डिफेंस इंडेक्स में 7 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई.
मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स ने भी शानदार प्रदर्शन किया. निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,152 अंक यानी 2.02 प्रतिशत बढ़कर 58,227.20 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 334.65 अंक यानी 1.90 प्रतिशत की मजबूती के साथ 17,989.90 पर पहुंच गया. कुल मिलाकर, अगले सप्ताह अमेरिकी ब्याज दरों में बदलाव, व्यापार समझौतों की प्रगति और विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करेगा. विशेषज्ञ निवेशकों से सतर्क रहने और वैश्विक घटनाक्रमों पर नज़र बनाए रखने की सलाह दे रहे हैं.
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(फाइल फोटो)
IOC to Produce Jet Fuel: अब तक जिस खाने के तेल को लोग कचरे में फेंक देते थे, वही तेल जल्द ही हवाई जहाज उड़ाने में इस्तेमाल किया जाएगा. देश की सबसे बड़ी पेट्रोलियम कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने इतिहास रचते हुए बड़ा कदम उठाया है. हरियाणा के पानीपत स्थित रिफाइनरी को सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) तैयार करने के लिए इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन मिल गया है. इस तरह की मान्यता पाने वाली IOC भारत की पहली कंपनी बन गई है.
IOC के चेयरमैन अरविंदर सिंह साहनी के मुताबिक, पानीपत रिफाइनरी में इस साल दिसंबर से इस्तेमाल किए हुए तेल से एविएशन फ्यूल का उत्पादन शुरू हो जाएगा. कंपनी का अनुमान है कि शुरुआती चरण में हर साल करीब 35,000 टन SAF बनाने की क्षमता विकसित हो जाएगी. इसके लिए बड़े होटल,रे स्टोरेंट और प्रमुख फूड चेन जैसे हल्दीराम से इस्तेमाल किया हुआ तेल इकट्ठा किया जाएगा. आमतौर पर यह वही तेल होता है जिसे एक बार तलने या पकाने के बाद दोबारा प्रयोग में नहीं लाया जाता.
इस्तेमाल किए हुए तेल की चुनौती
IOC का कहना है कि भारत में इस्तेमाल किया हुआ तेल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है. असली चुनौती इसे छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों से इकट्ठा करने की है. कंपनी इसके लिए एक विशेष सिस्टम पर काम कर रही है, ताकि तेल को व्यवस्थित तरीके से संग्रहित कर रिफाइनरी तक पहुंचाया जा सके.
क्या है सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल?
सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) एक वैकल्पिक बायोफ्यूल है, जो पारंपरिक जेट फ्यूल की तुलना में काफी कम कार्बन उत्सर्जन करता है. इसका उत्पादन खाने का इस्तेमाल किया हुआ तेल, कृषि अवशेष और अन्य बायो-वेस्ट से किया जाता है. SAF को पारंपरिक एविएशन टर्बाइन फ्यूल में 50% तक मिलाया जा सकता है.
भारत सरकार की योजना
भारत सरकार ने वर्ष 2027 से इंटरनेशनल फ्लाइट्स के लिए बेचे जाने वाले ईंधन में कम से कम 1 फीसदी SAF मिश्रण अनिवार्य कर दिया है. इससे भारत का एविएशन सेक्टर ज्यादा पर्यावरण-हितैषी और टिकाऊ बन सकेगा. साहनी का कहना है कि यूरोपीय देशों ने पहले ही SAF को अनिवार्य किया हुआ है,इ सलिए भविष्य में यूरोपीय एयरलाइंस IOC का सस्टेनेबल फ्यूल खरीद सकती हैं.
यह पहल न केवल एविएशन इंडस्ट्री का कार्बन फुटप्रिंट घटाने में मदद करेगी बल्कि इस्तेमाल किए हुए खाने के तेल का बेहतर इस्तेमाल भी सुनिश्चित करेगी. माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में यह कदम भारत को ग्रीन एनर्जी हब बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा.
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प्रतीकात्मक तस्वीर
Indian Currency Value in International Market: विदेशी निवेशकों की लगातार लिवाली और कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट की बदौलत भारतीय रुपया सोमवार (20 अक्टूबर) को शुरुआती कारोबार में गिरावट दर्ज की गई. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 14 पैसे की मजबूती के साथ एक महीने के उच्च स्तर 87.88 पर पहुंच गया.
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की शुरुआत 87.94 पर हुई और शुरुआती कारोबार के दौरान यह सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव करता रहा. कारोबार के दौरान रुपये ने 87.95 का निचला स्तर और 87.88 का ऊपरी स्तर छुआ. खबर लिखे जाने तक रुपया 87.88 पर था, जो पिछले सत्र के मुकाबले 14 पैसे ज्यादा मजबूत है. शुक्रवार को यह डॉलर के मुकाबले 88.02 पर बंद हुआ था.
विश्लेषकों का कहना है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की तगड़ी खरीदारी और घरेलू शेयर बाजार में तेजी ने रुपये को सहारा दिया है. सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में सोमवार को शुरुआती सत्र में बढ़त देखने को मिली, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा.
इस बीच छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति को दर्शाने वाला डॉलर सूचकांक मामूली रूप से 0.02 प्रतिशत बढ़कर 98.45 पर पहुंच गया. वहीं, वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड वायदा कारोबार में 0.31 प्रतिशत गिरकर 61.10 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसे आयातक देशों के लिए राहत भरी खबर है, क्योंकि इससे आयात बिल घटता है और चालू खाते का घाटा नियंत्रित रहता है.
हालांकि, विपक्षी दलों ने रुपये में आई इस मामूली मजबूती पर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस और अन्य दलों का कहना है कि रुपये में हालिया दिनों में लगातार रुपये की वैल्यू में गिरने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं. उनकी कोई भी नीतियां दीर्घकाल में देश के लिए फायदेमंद साबित नहीं हो रही हैं. विपक्ष का तर्क है कि मोदी सरकार की "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" जैसी योजनाओं का जमीनी असर सीमित रहा है, जबकि निर्यात और औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े अभी भी उम्मीद से नीचे हैं.
आर्थिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि रुपये की मजबूती फिलहाल वैश्विक कारणों का परिणाम है, न कि घरेलू सुधारों का. विशेषज्ञों के अनुसार, अगर अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है या कच्चे तेल के दाम फिर से चढ़ते हैं, तो रुपये पर फिर दबाव बढ़ सकता है. फिलहाल बाजार में निवेशकों का रुख सकारात्मक बना हुआ है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए भारत को अपने औद्योगिक उत्पादन, निर्यात और विदेशी निवेश को बढ़ाने पर ध्यान देना होगा.
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