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Liver Cancer Prevention Foods: आपकी सेहत का सबसे मजबूत आधार आपकी लाइफस्टाइल होती है. आपकी रोजमर्रा की आदतें, जैसे खानपान, शारीरिक गतिविधियां, और मानसिक स्थिति-यह तय करती हैं कि आप बीमारियों से कितना सुरक्षित हैं. खासतौर पर जब बात कैंसर और लिवर की बीमारियों की हो, तो यह समझना जरूरी है कि केवल दवाइयां ही नहीं, बल्कि सही खानपान भी आपकी रक्षा कर सकता है.
हालांकि कोई भी फूड कैंसर को पूरी तरह से रोक नहीं सकता, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ विशेष खाद्य पदार्थ कैंसर और लिवर से जुड़ी बीमारियों का जोखिम काफी हद तक कम कर सकते हैं. जानिए ऐसे ही 5 सुपरफूड्स के बारे में जो आपकी सेहत को बनाए रखेंगे मजबूत.
1. बेरीज
स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, और रास्पबेरी जैसी बेरीज विटामिन C और शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती हैं. ये सेल्स को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाती हैं, जो स्किन, लंग्स और ब्रेस्ट जैसे अंगों में कैंसर की शुरुआत कर सकते हैं. साथ ही, इनसे इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है.
2. ब्रोकली
ब्रोकली एक क्रूसिफेरस सब्जी है, जो अपने कैंसर-रोधी गुणों के लिए जानी जाती है. इसमें मौजूद सल्फोराफेन और अन्य फाइटोकेमिकल्स शरीर में कार्सिनोजेनिक तत्वों को बेअसर करते हैं और सेल्स को कैंसरग्रस्त होने से बचाते हैं.
3. पालक
पालक में आयरन, फोलेट, और फाइबर के साथ-साथ शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स भी होते हैं. यह लिवर की सूजन को कम करता है और लिवर सेल्स की सुरक्षा करता है. लिवर कैंसर का जोखिम घटाने में पालक एक प्राकृतिक ढाल की तरह काम करता है.
4. सैल्मन
सैल्मन मछली में भरपूर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है, जो लिवर की सूजन को कम करता है और फैटी लिवर डिजीज जैसी समस्याओं से बचाव करता है. नियमित रूप से सैल्मन का सेवन लिवर के कामकाज को बेहतर बनाता है.
5. साबुत अनाज
ब्राउन राइस, ओट्स, और साबुत गेहूं से बनी रोटियां फाइबर से भरपूर होती हैं. ये न केवल पाचन को सुधारते हैं, बल्कि ब्लड शुगर और वजन को कंट्रोल में रखकर लिवर पर पड़ने वाले तनाव को भी कम करते हैं. इससे लिवर हेल्दी रहता है और कैंसर का जोखिम घटता है.
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Immunity: अक्सर लोग सोचते हैं कि इम्युनिटी यानी रोग-प्रतिरोधक क्षमता हमेशा एक जैसी रहती है. या तो मजबूत या फिर कमजोर. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा नहीं है. हमारी इम्युनिटी लगातार ऊपर-नीचे होती रहती है. कभी यह बहुत मजबूत होती है और कभी अचानक गिर भी जाती है. इस उतार-चढ़ाव को वैज्ञानिक “इम्युनिटी ड्रॉप कर्व” कहते हैं.
2021 में नेचर रिव्यूज इम्युनोलॉजी में प्रकाशित शोधों के मुताबिक, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कभी भी स्थिर नहीं रहती. यह लगातार ऊपर-नीचे होती रहती है और कभी-कभी अचानक गिर भी जाती है. यही कारण है कि समान वातावरण में रहने वाले दो लोग एक ही वायरस से अलग-अलग प्रभावित होते हैं. 'इम्युनिटी ड्रॉप कर्व' को मौसम के हिसाब से देखें तो यह सबसे स्पष्ट रूप से सर्दियों में दिखाई देता है.
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की 2020 की शोध बताती है कि ठंड बढ़ते ही शरीर में विटामिन डी का स्तर गिरता है, नाक की म्यूकोसा परत कमजोर पड़ती है और वायरस हवा में अधिक देर सक्रिय रहते हैं. इससे हमारी इम्युनिटी की कर्व नीचे की ओर झुकने लगती है. यही वजह है कि फ्लू, वायरल फीवर और सर्दी-जुकाम के मामले नवंबर से फरवरी के बीच कई देशों में अपने चरम पर पहुंच जाते हैं.
उम्र भी इस कर्व का एक बड़ा घटक है, जैसा कि स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की 2019 में की गई स्टडी बताती है. इस अध्ययन से पता चलता है कि 40 की उम्र के बाद टी सेल्स इम्यून कोशिकाएं धीमी हो जाती हैं और 60 के बाद यह गिरावट तेज हो जाती है. इसका मतलब यह है कि उम्र बढ़ने के साथ कर्व की "डाउनवर्ड स्लोप" ज्यादा बार और ज्यादा गहरी दिखाई देती है. यही कारण है कि बड़े लोग एक वायरस के प्रभाव में अधिक जल्दी आते हैं और युवा जल्दी रिकवर कर लेते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि इम्युनिटी ड्रॉप कर्व सिर्फ प्राकृतिक कारणों से नहीं बनता. यह हमारी जीवनशैली के माइक्रो-फैक्टर्स से भी प्रभावित हो जाता है. एक स्टडी में पाया गया कि भोजन में सल्फर-समृद्ध सब्जियों, हाई-फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट की कमी आंतों के माइक्रोबायोम को कमजोर कर देती है. क्योंकि लगभग 70 फीसदी इम्युनिटी आंत से नियंत्रित होती है, इसलिए खानपान में छोटी गलतियां भी कर्व में डिप ला सकती हैं.
संक्रमण का दबाव इस कर्व को हमेशा बदलता रहता है. शरीर पहली बार जब किसी वायरस से लड़ता है, तो कर्व गहराई तक गिरता है, लेकिन रिकवरी के साथ यह अचानक ऊपर उठ जाता है. इसे इम्यून बूस्ट फेज कहा जाता है. यही पैटर्न कोविड-19 में स्पष्ट रूप से देखा गया, जहां हल्के संक्रमण के बाद भी कुछ सप्ताह तक प्रतिरोधक क्षमता अस्थिर बनी रही.
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Fenugreek Leaves Health Benefits: सर्दियों के मौसम में हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर असर पड़ता है. इस मौसम में अक्सर लोग सर्दी-जुकाम, पेट की समस्याओं और ब्लड शुगर के उतार-चढ़ाव जैसी परेशानियों से जूझते हैं. ऐसे में मेथी इन सभी परेशानियों का रामबाण उपाय है, जिसे अक्सर हम केवल रोटियों या पराठों में स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
आयुर्वेद के अनुसार मेथी एक 'उष्ण' प्रकृति वाली जड़ी-बूटी है, जिसका सेवन वात और कफ दोष को संतुलित करने में मदद करता है. यह न केवल शरीर को गर्मी देता है, बल्कि पाचन शक्ति को भी मजबूत करता है. आधुनिक विज्ञान में मेथी को भी सेहत का वरदान माना गया है. इसके पत्तों में मौजूद फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और अन्य तत्व शरीर को कई तरह से लाभ पहुंचाते हैं.
ब्लड शुगर
सर्दियों में कई लोगों का शुगर अचानक बढ़ जाता है. मेथी के पत्तों में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो इंसुलिन की कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं और ब्लड में शुगर लेवल को नियंत्रित करने में मदद करते हैं. आयुर्वेद में इसे सिद्ध उपाय माना गया है क्योंकि यह शरीर में स्थिरता लाने में मदद करता है. छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी के लिए यह सुरक्षित और प्राकृतिक तरीका है.
पाचन तंत्र
ठंड के कारण कई बार पेट भारी या फूला हुआ महसूस होता है. मेथी के पत्तों में मौजूद पोषक तत्व आंतरिक मार्ग को साफ रखते हैं और अपच या एसिडिटी जैसी परेशानियों को कम करते हैं. आयुर्वेद के अनुसार, यह अम्लता और वात से जुड़ी परेशानियों को कम करने में मदद करता है, जबकि विज्ञान बताता है कि मेथी के पत्तों में सोल्याबल फाइबर और एंजाइम पाचन प्रक्रिया को सुचारु बनाते हैं.
सर्दी-जुकाम
मेथी के पत्तों में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं. आयुर्वेद के अनुसार यह कफ और वात दोष को संतुलित करके शरीर को संक्रमण से लड़ने में सक्षम बनाता है. यही कारण है कि सर्दियों में मेथी का सूप या पराठा खाने से सर्दी और खांसी की संभावना कम हो जाती है.
वजन नियंत्रण
मेथी के पत्ते फाइबर से भरपूर होते हैं, जो पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करते हैं. इससे भूख नियंत्रित रहती है और वजन बढ़ने की संभावना कम होती है. आयुर्वेद में इसे संतुलित आहार का हिस्सा माना जाता है, क्योंकि यह शरीर में ऊर्जा बनाए रखता है.
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Makhana farming UP: उत्तर प्रदेश के बागवानी, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार और कृषि निर्यात राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने सोमवार को लखनऊ में मखाना विकास योजना की औपचारिक घोषणा की. भारत सरकार द्वारा 2025 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के गठन के बाद शुरू की गई यह योजना पहले चरण में उत्तर प्रदेश सहित 10 राज्यों में लागू की जा रही है.
इस योजना का संचालन उत्तर प्रदेश का बागवानी विभाग करेगा. केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए कार्य योजना को मंजूरी दे दी है और 158 लाख रुपये जारी किए हैं, जिसके माध्यम से राज्य में मखाना उत्पादन बढ़ाने के लिए व्यापक कार्यक्रम चलाए जाएंगे.
इस फंड का उपयोग तालाबों के चयन और निर्माण, किसान प्रशिक्षण, फ्रंटलाइन प्रदर्शन, खरीदार-विक्रेता बैठकों, मखाना पवेलियन के माध्यम से प्रचार, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में निर्यातकों की भागीदारी और जिला और राज्य स्तरीय सेमिनारों के आयोजन के लिए किया जाएगा. मखाना के लिए उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना का भी प्रस्ताव है. मंत्री सिंह ने कहा कि मखाना एक सुपरफूड है, जिसकी मांग देश और विदेश दोनों जगह तेजी से बढ़ रही है और उत्तर प्रदेश की जलवायु इसके उत्पादन के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है.
पूर्वांचल के कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, गाजीपुर, बलिया, महाराजगंज, वाराणसी और बस्ती जिलों को मखाना की खेती के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है. जहां भी सिंघाड़े की खेती सफल होती है, वहां मखाना आसानी से उगाया जा सकता है. सरकार अगले वित्तीय वर्ष में मखाना उत्पादन क्षेत्र का काफी विस्तार करने, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उपलब्ध कराने और प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है, ताकि मखाना किसानों को सीधे आर्थिक लाभ मिल सके.