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Kidney Cyst Symptoms: बहुत से लोग किडनी सिस्ट से परेशान रहते हैं. ये छोटी, फ्लूइड से भरी थैलियां होती हैं. ज़्यादातर मामलों में ये हानिरहित होती हैं, लेकिन समस्या तब होती है जब सिस्ट का आकार बढ़ने लगता है, जिससे पेट या पीठ के निचले हिस्से में दर्द, पेशाब करते समय जलन, बार-बार इन्फेक्शन या ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है.
आयुर्वेद के अनुसार, किडनी सिस्ट बनने का कारण शरीर में रुकावटें, कफ का जमा होना और लाइफस्टाइल में असंतुलन है. कई मामलों में शुरुआती स्टेज में हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर और कुछ पारंपरिक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करके राहत मिल सकती है, हालांकि कोई भी उपाय आज़माने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है.
किडनी सिस्ट के कारण अक्सर हमारी रोज़ाना की आदतों में छिपे होते हैं, जैसे कम पानी पीना, रात को देर तक जागना, ज़्यादा नमक या मसालेदार खाना खाना, मीठा खाने की आदत, शरीर में सूजन बढ़ना, कब्ज़ या पाचन धीमा होना. ये छोटी-छोटी गलतियां धीरे-धीरे किडनी पर असर डालती हैं.
आयुर्वेद कुछ पारंपरिक उपाय बताता है, जिसमें गोक्षुर और एलोवेरा जूस का मिश्रण, वरुण चूर्ण, गिलोय सत्व, खीरा, पुदीना और धनिया से बना पानी, पुनर्नवा और अश्मभेद का काढ़ा, रात भर भिगोए हुए किशमिश, हल्का लौकी का पानी और रात को त्रिफला लेना शामिल है. कई लोग सूजन कम करने, हल्का महसूस करने और पाचन को संतुलित रखने के लिए इन उपायों का इस्तेमाल करते हैं.
इसी तरह, मत्स्यासन, भुजंगासन और मकरासन जैसे हल्के योगासन किडनी के एरिया में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं. कुछ लोग सुबह तांबे के बर्तन में रखा पानी भी पीते हैं, जिसे पारंपरिक रूप से पाचन और सफाई के लिए फायदेमंद माना जाता है. किडनी सिस्ट वाले लोगों को भारी, ज़्यादा नमकीन या प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करना चाहिए.
आयुर्वेदिक नज़रिए से लौकी, खीरा, नारियल पानी, गाजर और हल्की दालें जैसे हल्के और पानी वाले खाद्य पदार्थ बेहतर माने जाते हैं. साथ ही, 7-8 गिलास पानी पीना, समय पर सोना, नमक का सेवन सीमित करना, रोज़ 30 मिनट चलना और अपनी क्षमता के अनुसार प्रोटीन का सेवन करना फायदेमंद होता है.
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Superfoods for Women: आज के दौर में महिलाएं न सिर्फ घर और बाहर की जिम्मेदारियां संभालती हैं बल्कि उनका शरीर भी भीतर से कई अहम भूमिकाएं निभाता है. हार्मोन संतुलन बनाए रखना, हड्डियों को मजबूत करना, मानसिक शांति देना, मां बनने की तैयारी करना और उम्र के साथ होने वाले बदलावों को सहन करना. ये सब एक महिला का शरीर रोज़ करता है. इसके बावजूद कई महिलाएं थकान, तनाव, सूजन (इंफ्लेमेशन) और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं से जूझती हैं. इसका मुख्य कारण कमजोरी नहीं, बल्कि पोषण की कमी है. जब शरीर की जड़ों तक सही पोषण नहीं पहुंचता, तो असंतुलन और परेशानी महसूस होने लगती है.
आयुर्वेद में महिलाओं के शरीर को बेहद पवित्र और शक्तिशाली माना गया है. यही वजह है कि आयुर्वेद रोजाना पोषण और संतुलन पर ज़ोर देता है. अगर महिलाएं अपनी डाइट में कुछ विशेष सुपरफूड शामिल करें तो उनका स्वास्थ्य लंबे समय तक बेहतर रह सकता है. आइए जानते हैं ऐसे ही पांच सुपरफूड के बारे में...
1. शतावरी
शतावरी को आयुर्वेद में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए सबसे खास माना गया है. यह न केवल प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि मानसिक शांति और हार्मोन संतुलन में भी मदद करता है. शतावरी शरीर को ठंडक देती है, जिससे पीरियड्स में ज्यादा रक्तस्राव, पेट में जलन या चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं से राहत मिलती है. इसे रात में गर्म दूध के साथ लेने से शरीर को गहरी नींद भी आती है और मन शांत रहता है.
2. काला तिल
काले तिल कैल्शियम, आयरन और हेल्दी फैट्स से भरपूर होते हैं. यह हड्डियों को मज़बूती देने के साथ-साथ हार्मोन को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. खासकर डिलीवरी के बाद और मेनोपॉज़ के समय यह महिलाओं के लिए बेहद फायदेमंद हैं. इन्हें सब्ज़ियों या चावल में भूनकर मसाले की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। नियमित सेवन से यह न केवल शरीर को ताकत देते हैं बल्कि बालों और त्वचा की सेहत भी बनाए रखते हैं.
3. आंवला
आंवला विटामिन C का सबसे अच्छा प्राकृतिक स्रोत माना जाता है. यह बाल, त्वचा, इम्यून सिस्टम और पाचन तंत्र के लिए वरदान है. एक्ने की समस्या हो या बालों का झड़ना, आंवला हर तरह से मदद करता है. सुबह आंवला जूस पीने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और स्किन ग्लो करने लगती है. आंवले को अचार, चटनी या मुरब्बे के रूप में भी डाइट में शामिल किया जा सकता है.
4. रागी
रागी को ‘कैल्शियम का पावरहाउस’ कहा जाता है. इसमें आयरन और अमीनो एसिड भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यह न केवल हड्डियों की मज़बूती के लिए जरूरी है बल्कि नींद की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाता है. मेनोपॉज़ के बाद जब महिलाओं की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं, उस समय रागी बेहद लाभकारी होती है. इसे खिचड़ी, रोटी या दलिया बनाकर आसानी से खाया जा सकता है.
5. घी
घी भारतीय खानपान का अहम हिस्सा है और आयुर्वेद में इसे अमृत समान माना गया है. यह शरीर के ऊतकों को पोषण देता है, तनाव कम करता है और पाचन को मजबूत बनाता है. ड्राई स्किन की समस्या हो या नींद की कमी, घी दोनों में मदद करता है. रात को दूध में थोड़ा सा जायफल और घी मिलाकर पीने से नींद गहरी आती है और मन शांत रहता है.
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Afternoon Energy Slump: दोपहर का समय अक्सर ऐसा होता है, जब शरीर में अचानक सुस्ती आने लगती है. खाना पच रहा होता है, दिमाग भारी-सा लगने लगता है और काम में मन नहीं लगता. Ayurveda के अनुसार दोपहर का समय “पित्त प्रधान समय” माना जाता है. इस समय पाचन शक्ति अच्छी होती है, लेकिन अगर सही आदतें न हों तो थकान जल्दी लगती है. अच्छी बात यह है कि कुछ छोटी-छोटी आदतों से आप दोपहर की सुस्ती को दूर कर सकते हैं और खुद को फिर से एक्टिव बना सकते हैं.
दोपहर का खाना हल्का और संतुलित रखें
दोपहर की एनर्जी सीधे आपके खाने से जुड़ी होती है. बहुत भारी, तला-भुना या ज्यादा मसालेदार खाना खाने से शरीर सुस्त हो जाता है. बेहतर है कि आप दाल, सब्जी, चावल या रोटी और थोड़ा-सा घी अपने भोजन में रखें. दही थोड़ी मात्रा में लेना फायदेमंद रहता है. कोशिश करें कि पेट को पूरा भरने की बजाय थोड़ा हल्का रखकर खाएं. खाने के तुरंत बाद मोबाइल चलाने या लेट जाने से बचें. शरीर को खाना पचाने का आरामदायक समय दें.
खाने के बाद 10–15 मिनट की हल्की वॉक करें
खाने के बाद थोड़ी देर टहलना बहुत फायदेमंद होता है. इसे आयुर्वेद में “भोजन पश्चात विहार” कहा गया है. तेज चलने की जरूरत नहीं, बस आराम से 10 से 15 मिनट पैदल चलें. इससे पाचन ठीक रहता है, पेट भारी नहीं होता और सुस्ती कम होती है. ऑफिस में हों तो गलियारे में ही थोड़ा टहल लें. वॉक के बाद 2–3 सिप पानी पी सकते हैं, लेकिन ज्यादा पानी न पिएं.
प्राकृतिक हर्बल एनर्जी बूस्टर अपनाएं
दोपहर की थकान में बार-बार चाय या कॉफी पीना सही आदत नहीं है. इसकी जगह आप जीरा-पानी या पुदीना मिला गुनगुना पानी पी सकते हैं. इससे पेट हल्का रहता है और शरीर एक्टिव बना रहता है. 2 मिनट गहरी सांस लेना भी एक शानदार तरीका है. इससे दिमाग तक ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचती है और नींद-सी नहीं आती. चाहें तो हल्का सा गर्म नींबू पानी भी ले सकते हैं. गर्दन और सिर की हल्की मालिश करने से भी आंखों की थकान और भारीपन कम होता है.
छोटे सुधार, बड़ा फायदा
अगर आप दोपहर में सही खाना खाएं, हल्की वॉक करें और प्राकृतिक एनर्जी बूस्टर अपनाएं, तो आपकी प्रोडक्टिविटी अपने आप बढ़ जाएगी. ये तीन छोटी आदतें दिन को थकाऊ होने से बचाती हैं और काम में फोकस बनाए रखती हैं.
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इस साल नवंबर में घर पर बने शाकाहारी और मांसाहारी खाने की कीमत में पिछले साल के मुकाबले 13 प्रतिशत की गिरावट आई, जिसका कारण सब्जियों और दालों की कीमतों में कमी थी. CRISIL इंटेलिजेंस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ज़्यादा सप्लाई के कारण टमाटर की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 17 प्रतिशत की गिरावट आई, और हाई बेस इफ़ेक्ट के कारण आलू की कीमतों में 29 प्रतिशत की गिरावट आई. हालांकि, पिछले सीज़न के रबी स्टॉक में बढ़ोतरी और कम एक्सपोर्ट के कारण प्याज की कीमतों में 53 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्टॉक में बढ़ोतरी और चना, पीली मटर और उड़द दाल के भारी इंपोर्ट के कारण दालों की कीमतों में 17 प्रतिशत की गिरावट आई. हालांकि, शाकाहारी थाली की कीमत में महीने के आधार पर 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि इसके उलट, नवंबर में मांसाहारी थाली की कीमत में 1 प्रतिशत की गिरावट आई.
CRISIL इंटेलिजेंस के डायरेक्टर, पुष्पन शर्मा ने कहा, "मीडियम टर्म में, खरीफ फसल की कटाई में देरी और कम पैदावार के कारण प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है. हालांकि, कोल्ड स्टोरेज का स्टॉक बाज़ार में आने से आलू की कीमतों में गिरावट देखी जा सकती है." शर्मा ने आगे कहा, "फर्म का अनुमान है कि पीली मटर पर 30 प्रतिशत इंपोर्ट ड्यूटी के कारण आने वाले समय में दालों की कीमतें एक सीमित दायरे में रहेंगी. इसके अलावा, उड़द दाल के बिना किसी रोक-टोक के इंपोर्ट से भी दालों की कीमतें कंट्रोल में रहेंगी."
उन्होंने आगे कहा कि कोई भी पॉलिसी दखल, जैसे कि इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी, दालों की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव डाल सकती है. त्योहारी सीज़न के दौरान ज़्यादा मांग के कारण वनस्पति तेल की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इसके अलावा, LPG गैस सिलेंडर की कीमत में पिछले साल के मुकाबले 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने थाली की कीमत में कुल गिरावट को सीमित कर दिया.
दूसरी ओर, मांसाहारी थाली की कीमत में गिरावट का कारण ब्रॉयलर चिकन की कम कीमतें थीं. ब्रॉयलर चिकन की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 12 प्रतिशत की गिरावट आई, जो मांसाहारी थाली की कीमत का 50 प्रतिशत है. घर पर खाना बनाने की औसत लागत की गणना उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत में मौजूदा इनपुट कीमतों के आधार पर की जाती है. इन कीमतों में मासिक बदलाव आम आदमी के खर्चों पर पड़ने वाले असर को दिखाते हैं.