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Fatty Liver Diet: अमेरिका के फ्लोरिडा के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सलहब ने बताया है कि कुछ खास फल और सब्जियां आपकी लिवर हेल्थ को बेहतर बना सकती हैं. उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में ऐसे 7 फूड्स का जिक्र किया है जो लिवर को मजबूत करते हैं और शरीर की ओवरऑल हेल्थ को भी सुधारते हैं. डॉ. सलहब कहते हैं कि फल और सब्जियां सिर्फ रंग और स्वाद नहीं बढ़ातीं, बल्कि इनमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सिडेंट्स शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में मदद करते हैं.
डॉ. सलहब सलाह देते हैं कि अगर आप डार्क चॉकलेट खाते हैं, तो उसमें 70% या उससे अधिक कोको होना चाहिए. उनका कहना है कि इन फलों और सब्जियों को रोज की डाइट में शामिल करने से लिवर टॉक्सिन्स कम होते हैं और शरीर ज्यादा एनर्जी से भर जाता है.
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What is Hing: हींग भारतीय रसोई का ऐसा मसाला है जो किसी भी खाने में बस एक चुटकी डालते ही उसका स्वाद और खुशबू कई गुना बढ़ा देता है. दाल, सब्जी या खिचड़ी कहीं भी हींग डाल दी जाए, तो उसका स्वाद और सुगंध तुरंत निखर जाती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हींग बनती कैसे है और यह हमारे शरीर के लिए कितनी फायदेमंद है.
हींग क्या है और कहां से आती है?
हींग किसी पेड़ से मिलने वाला साधारण मसाला नहीं है, बल्कि यह एक जंगली पौधे की जड़ों से निकलने वाला गोंद (रस) है. इसकी खुशबू बेहद तीखी और तेज होती है. पुराने समय में इसका उत्पादन खुरासान और मुल्तान (आज के ईरान-अफगानिस्तान क्षेत्र) में होता था, इसलिए इसे बाल्हीक भी कहा जाता है. माना जाता है कि बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से ही यह भारत तक पहुंची.
आज इस्तेमाल होने वाली हींग कैसे बनती है?
भारत में जो हींग इस्तेमाल होती है, वह कंपाउंडेड हींग कहलाती है. इसमें शुद्ध हींग सिर्फ 30% या उससे भी कम होती है. बाकी में मैदा, आटा, गोंद और अन्य चीजें मिलाई जाती हैं, ताकि इसकी तीखी गंध थोड़ी हल्की हो जाए और खाना बनाने में आसानी से इस्तेमाल हो सके. बाजार में मिलने वाली हींग की खुशबू इसी पर निर्भर करती है कि उसमें मिलावट कितनी है. कम मिलावट मतलब गंध ज्यादा तेज.
भारत में हींग की खपत और इतिहास
भारत दुनिया में हींग का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन लंबे समय तक इसका उत्पादन भारत में नहीं होता था. कच्ची हींग अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया से आयात की जाती थी. मुगल काल में आगरा हींग व्यापार का बड़ा केंद्र था. अफगानिस्तान से हींग भेड़ों की खाल में भरकर लाई जाती थी. आगरा पहुंचने के बाद ही हींग और चमड़े का अलग-अलग व्यापार होता था. यहीं से आगरा का जूते का उद्योग भी आगे बढ़ा. आज भारत में हाथरस हींग शोधन का सबसे बड़ा केंद्र है. भारत में हींग की खेती भी शुरू हो चुकी है, जिसके लिए 2016–17 में ईरान से इसके बीज लाए गए थे.
हींग के घरेलू और सेहत संबंधी फायदे
हींग सिर्फ रसोई का मसाला नहीं, बल्कि एक घरेलू दवा भी है. पेट में गैस हो तो हींग को पानी में घोलकर नाभि पर लगाने से तुरंत आराम मिलता है. छोटे बच्चों के पेट दर्द में भी यह उपाय बहुत कारगर है. हींग पाचन सुधारती है, गैस दूर करती है और शरीर की सूजन कम करने में मदद करती है. इसी कारण हींग भारतीय भोजन का जरूरी हिस्सा बन चुकी है. सिर्फ स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी.
प्रतीकात्मक तस्वीर
Gallstones in Children: अब तक पित्ताशय की पथरी को आमतौर पर बड़ों की बीमारी माना जाता था, लेकिन हाल के सालों में भारत में बच्चों में भी इसके मामले बढ़ने लगे हैं. बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि यह बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर बदलाव है और माता-पिता को इस पर ध्यान देने की जरूरत है.
चिकित्सकों के अनुसार, देश के कई अस्पतालों और क्लीनिक में छोटे बच्चों में भी पित्त की पथरी के मामले सामने आ रहे हैं. पहले इसे मध्य आयु वर्ग की बीमारी समझा जाता था, लेकिन अब छह साल तक के बच्चों में भी यह समस्या देखी जा रही है. पित्ताशय की पथरी दरअसल छोटे-छोटे कठोर पत्थर होते हैं, जो पित्त में मौजूद कोलेस्ट्रॉल या बिलीरुबिन से बनते हैं. जब ये पित्ताशय या पित्त नली में फंस जाते हैं तो तेज पेट दर्द, मतली, उल्टी और पाचन संबंधी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं.
'इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स' (IAP) ने पांच बड़े शहरों में एक सर्वे किया, जिसमें पाया गया कि पेट दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे लगभग हर 200 में से एक बच्चे को पित्त की पथरी की समस्या थी. यह समस्या खासतौर पर उन बच्चों में ज्यादा देखी गई है जो शारीरिक रूप से कम सक्रिय रहते हैं और ज्यादा मात्रा में जंक फूड या तला-भुना खाना खाते हैं.
'एकेडमी ऑफ फैमिली फिजिशियंस ऑफ इंडिया' के चेयरमैन डॉ. रमण कुमार ने बताया कि अल्ट्रासाउंड से इस बीमारी का सुरक्षित और आसान पता लगाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि कई बच्चों में जब पथरी के खास लक्षण नहीं दिखते तो दवाओं और खानपान में बदलाव से इलाज किया जा सकता है. हालांकि, अगर पथरी के कारण पित्ताशय में सूजन या पैनक्रिएटाइटिस जैसी समस्या हो जाए तो सर्जरी करनी पड़ती है.
जहां बच्चों में लक्षण दिखाई देते हैं, वहां लैप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टॉमी (पित्ताशय निकालने की प्रक्रिया) सबसे ज्यादा अपनाया जाने वाला इलाज है, लेकिन जिन बच्चों में अल्ट्रासाउंड में पथरी दिखती है पर लक्षण नहीं होते, वहां इलाज को लेकर दुविधा रहती है.
डॉ. सिन्हा का कहना है कि ऐसे मामलों में या तो कुछ समय तक इंतजार किया जाता है या जरूरत पड़ने पर सर्जरी की जाती है. उन्होंने सलाह दी कि माता-पिता को इंतजार के दौरान हो सकने वाली जटिलताओं जैसे पीलिया या अग्नाशय की सूजन के जोखिम को समझना चाहिए और डॉक्टर की सलाह से उचित निर्णय लेना चाहिए. कई परिवार एहतियात के तौर पर जल्दी सर्जरी करवाना ही बेहतर मानते हैं.
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(प्रतीकात्मक तस्वीर)
Dengue Case in India: देश में डेंगू का प्रकोप अभी पूरी तरह से नहीं बढ़ा है, लेकिन आने वाले समय में खतरा बढ़ सकता है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सोमवार को बताया कि अगस्त 2025 तक डेंगू के 49,573 मामले सामने आए हैं और इस मच्छर जनित बीमारी से 42 लोगों की मौत हो चुकी है. स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को इस पर एक उच्च स्तरीय बैठक में जानकारी दी गई, जिसमें डेंगू से निपटने के लिए राज्यों को सतर्क रहने की सलाह दी गई.
राजधानी दिल्ली में भी डेंगू के मामलों में गिरावट देखने को मिली है. 31 अगस्त तक दिल्ली में 964 केस दर्ज हुए, जबकि पिछले साल इसी समय में ये आंकड़ा 1,215 था. इसके बावजूद मंत्रालय ने कहा कि सावधानी बरतना जरूरी है ताकि बीमारी पर समय रहते नियंत्रण किया जा सके. दिल्ली-एनसीआर के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में भी डेंगू के मामले बढ़े हैं. उत्तर प्रदेश में 1,646 केस दर्ज हुए, जबकि राजस्थान में 1,181 और हरियाणा में 298 मामले सामने आए हैं.
मंत्रालय ने बताया कि 2024 में पूरे देश में डेंगू के 2,33,519 मामले सामने आए थे, जिनमें 297 लोगों की मौत हुई थी. अभी डेंगू का प्रकोप कम है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री ने राज्यों से कहा कि वे बारिश और जलभराव के चलते संभावित संकट से निपटने की पूरी तैयारी करें. खासतौर पर स्कूलों, श्रमिक शिविरों और डेंगू प्रभावित इलाकों में विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता बताई गई है ताकि बीमारी के फैलाव को रोका जा सके.
स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने अस्पतालों को भी अलर्ट रहने को कहा है. उन्होंने निर्देश दिया कि अस्पतालों में बिस्तर, दवाइयां, कीटनाशक, रक्त के घटक और निदान सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होनी चाहिए. साथ ही सेंटिनल सर्विलांस अस्पतालों को सतर्क रखा जाए और अन्य सार्वजनिक व निजी अस्पतालों को भी अलर्ट कर दिया जाए. बुखार के मामलों वाले क्षेत्रों में कीटाणुनाशक धुंआ छिड़कने और मच्छरों के पनपने वाले स्थानों को साफ करने की दिशा में तेज अभियान चलाने पर जोर दिया गया है.
डेंगू से बचाव के लिए मंत्रालय ने ‘ऑक्टालॉग’ नामक एक राष्ट्रीय रणनीति लागू की है. यह योजना आठ मुख्य बिंदुओं पर आधारित है, जैसे निगरानी, केस मैनेजमेंट, वेक्टर नियंत्रण, प्रकोप प्रतिक्रिया, क्षमता निर्माण, व्यवहार में बदलाव संचार, अंतर-मंत्रालयी समन्वय और निगरानी. इस रणनीति के तहत कई राज्यों में अभियान चलाए जा रहे हैं, जिसमें समुदाय को जागरूक करने, नि:शुल्क जांच सुविधाएं देने और रोग के नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
मंत्रालय ने यह भी बताया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत वित्तीय सहायता दी जा रही है और राज्यों को समय-समय पर प्रशिक्षण व सलाह दी जा रही है. इसके साथ ही, स्कूलों और श्रमिक शिविरों जैसे जगहों पर डेंगू प्रभावित क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को मच्छरों से बचाव के उपाय बताने की योजना बनाई गई है. जेपी नड्डा ने कहा कि लंबी बारिश और जलभराव के कारण डेंगू का खतरा और बढ़ सकता है, इसलिए राज्य सरकारों को पहले से तैयार रहना चाहिए ताकि किसी महामारी जैसी स्थिति से समय रहते निपटा जा सके.
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