फाइल फोटो
सर्दी की शुरुआत और दिवाली के बाद लगभग हर राज्य में वायु की गुणवत्ता में गिरावट आती है और प्रदूषण, कोहरे के साथ मिलकर लोगों को बीमार करने लगता है. ऐसे में खुद को स्वस्थ रखने के लिए आप घर में मौजूद मूंगफली के दानों और गुड़ का इस्तेमाल कर सकते हैं.
सर्दी में प्रदूषण का स्तर बढ़ने से लोगों में श्वसन संबंधी रोग, बुखार, सर्दी-जुकाम, त्वचा संबंधी रोग, हेपेटाइटिस ए और हृदय रोग की समस्या बढ़ जाती है. ऐसे मौसम में मधुमेह और अस्थमा से पीड़ित लोगों को घर से न निकलने की सलाह दी जाती है.
प्रदूषण की वजह से बच्चों से लेकर बड़े तक प्रभावित होते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रदूषण की हल्की सर्दी का मौसम रोग प्रतिरक्षा प्रणाली पर असर डालता है और बार-बार बीमार होने का कारण बनता है, लेकिन घर में मौजूद मूंगफली और गुड़ प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से बचाव के साथ-साथ सर्दी से होने वाली बीमारियों से भी बचाएंगे. इसके लिए सुबह की शुरुआत मूंगफली के नाश्ते से करें.
इसे बनाने के लिए भुनी हुई मूंगफली, गुड़ और इलायची को मिलाकर छोटे-छोटे लड्डू बना लें और रोज सुबह इनका सेवन करें. मूंगफली में प्रोटीन, वसा, फाइबर, विटामिन और खनिज होते हैं, जो हृदय का संचालन अच्छे से करते हैं, शरीर को गर्म रखते हैं, और पाचन प्रबंधन में मदद करते हैं. गुड़ में मैग्नीशियम, आयरन, पोटैशियम, कैल्शियम, कार्बोहाइड्रेट और विटामिन बी 6 होता है, जो पाचन को अच्छा रखते हैं, रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाते हैं, शरीर से विषैले पदार्थों को निकालने में मदद करते हैं और शरीर में खून की कमी को पूरा करते हैं.
इलायची में एंटीऑक्सीडेंट, जिंक और सेलेनियम, कैल्शियम, पोटैशियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो नींद लाने में सहायक होते हैं, पाचन को अच्छा बनाते हैं, पेट की गर्मी को शांत करते हैं, दिल की बीमारियों के जोखिम को कम करते हैं और संक्रमण से भी बचाते हैं.
मूंगफली का नाश्ता (वेरकादलाई उरुंडई) दक्षिण भारत का नाश्ता है, जिसे सर्दी की शुरुआत में ही खाया जाता है. ये एक पारंपरिक मीठी डिश है, जिसे दक्षिण में दवा की तरह भी प्रयोग किया जाता है. खास बात ये है कि व्यंजन को बड़े से लेकर बच्चे तक खा सकते हैं. बच्चों के लिए लड्डू की मात्रा कम रखें, जबकि बड़े ज्यादा मात्रा में इसका सेवन कर सकते हैं. लड्डू का स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें सफेद तिल का इस्तेमाल भी कर सकते हैं.
फाइल फोटो
Sleep Divorce Trend: यूरोप के कई देशों में इन दिनों एक नया ट्रेंड काफी चर्चा में है, जिसे ‘स्लीप डिवोर्स’ कहा जा रहा है. स्वीडन, नॉर्वे और अन्य नॉर्डिक देशों में बड़ी संख्या में कपल्स अब बेहतर और आरामदायक नींद के लिए अपने साथी से अलग सोना पसंद कर रहे हैं. इस ट्रेंड में या तो अलग बिस्तर पर या कभी-कभी अलग कमरों में सोने की आदत शामिल है.
इस तरीके को स्कैंडिनेवियाई नींद संस्कृति भी कहा जा रहा है और माना जाता है कि यह नींद की गुणवत्ता सुधारने में मदद करता है. बहुत से लोग खर्राटे, देर से सोना या बेचैनी जैसी आदतों से परेशान होकर यह कदम उठाते हैं.
क्या होता है स्लीप डिवोर्स?
स्लीप डिवोर्स का मतलब कपल्स का रात में अलग सोना है ताकि किसी की आदतें दूसरे की नींद खराब न करें. यह ट्रेंड खासकर उन लोगों में लोकप्रिय है जिनका पार्टनर खर्राटे लेता है या करवट बदलते समय दूसरे की नींद में खलल पड़ता है. हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि कपल्स के अलग सोने से उनके रिश्तों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि एक साथ सोना भी जुड़ाव और भावनात्मक नज़दीकी का हिस्सा माना जाता है.
नई रिसर्च ने क्या बताया?
ताइवान में शोधकर्ताओं ने 860 कपल्स पर एक स्टडी की, जिसे ‘BMC Public Health’ में प्रकाशित किया गया. इस रिसर्च में दोनों पार्टनर्स की मानसिक सेहत और नींद के पैटर्न का विश्लेषण किया गया. नतीजों में पाया गया कि जो वृद्ध कपल अलग कमरों में सोते थे, उनकी मानसिक सेहत उन कपल्स के मुकाबले कम थी जो साथ सोते थे. रिसर्च में खुशी, जीवन में संतुष्टि और मानसिक शांति जैसे पैमानों से मानसिक स्वास्थ्य को मापा गया था.
अलग सोना रिश्ते पर कैसे असर डालता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, अलग सोना सिर्फ नींद की आदत नहीं बल्कि रिश्ते की स्थिति भी दर्शा सकता है. अगर पार्टनर अलग सोने लगें तो भावनात्मक दूरी बढ़ने का खतरा होता है. नींद और रिश्ते दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं और अच्छी नींद मानसिक सेहत का अहम हिस्सा है.
फाइल फोटो
Satish Shah Death News: बॉलीवुड और टीवी की दुनिया के मशहूर एक्टर सतीश शाह का निधन हो गया है. 25 अक्टूबर दोपहर 2:30 बजे उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली. जानकारी के मुताबिक, वे काफी समय से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे. उनके मैनेजर ने इस दुखद खबर की पुष्टि की है. सतीश शाह का अंतिम संस्कार 26 अक्टूबर को किया जाएगा. फिलहाल उनका पार्थिव शरीर अस्पताल में रखा गया है.
फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में शोक की लहर
सतीश शाह के निधन की खबर से फिल्म और टीवी इंडस्ट्री दोनों ही सदमे में हैं. हाल ही में विज्ञापन जगत की शख्सियत पीयूष पांडे के निधन के बाद अब सतीश शाह के जाने से इंडस्ट्री को एक और बड़ा झटका लगा है.
‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ से मिली घर-घर में पहचान
सतीश शाह ने अपने लंबे करियर में कई फिल्मों में शानदार काम किया, लेकिन उन्हें असली पहचान टीवी शो ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ से मिली. शो में उन्होंने इंद्रवदन साराभाई का किरदार निभाया था, जो दर्शकों को आज भी याद है. उनकी और रत्ना पाठक शाह (माया साराभाई) की जोड़ी ने दर्शकों को खूब हंसाया था.
टेलीविजन में छोड़ी अमिट छाप
सतीश शाह ने टीवी पर भी कई यादगार किरदार निभाए. उनका सिटकॉम ‘ये जो है जिंदगी’ (1984) आज भी क्लासिक माना जाता है, जिसमें उन्होंने हर एपिसोड में अलग किरदार निभाया था. इसके बाद ‘फिल्मी चक्कर’ और ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ जैसे शोज़ में उन्होंने अपनी बेहतरीन कॉमेडी से लोगों का दिल जीता.
फिल्मों में भी रहे दमदार
टीवी के अलावा सतीश शाह ने ‘मैं हूं ना’, ‘हम आपके हैं कौन’, ‘फना’, ‘मुझसे शादी करोगी’, ‘रा.वन’, ‘साजन चले ससुराल’, और ‘जाने भी दो यारों’ जैसी बड़ी फिल्मों में काम किया। शाहरुख खान की फिल्म ‘मैं हूं ना’ में उनका प्रोफेसर का किरदार दर्शकों को खूब हंसाता था.
निजी जीवन
सतीश शाह का जन्म गुजरात के मांडवी में हुआ था. उन्होंने जेवियर कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से अभिनय की पढ़ाई की. 1972 में उनकी शादी डिज़ाइनर मधु शाह से हुई थी. कोरोना काल में उन्होंने कोविड को मात भी दी थी.
प्रतीकात्मक फोटो
Vitamin B12 Deficiency Symptoms: विटामिन बी12 हमारे शरीर के लिए एक बेहद ज़रूरी पोषक तत्व है, जो रक्त निर्माण, मस्तिष्क स्वास्थ्य को बनाए रखने और तंत्रिकाओं को मज़बूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन जब इसकी कमी हो जाती है, तो धीरे-धीरे शरीर में कई तरह की समस्याएँ शुरू हो जाती हैं, जैसे थकान, चक्कर आना, भूलने की बीमारी या हाथ-पैरों में झुनझुनी। अगर समय रहते इसकी पहचान और इलाज न किया जाए, तो ये सामान्य लक्षण गंभीर बीमारियों का रूप ले सकते हैं। आइए जानते हैं बी12 की कमी से होने वाली 10 मुख्य बीमारियाँ।
मेगालोब्लास्टिक एनीमिया
B12 की कमी से शरीर में लाल रक्त कोशिकाएँ असामान्य रूप से बड़ी और अपरिपक्व हो जाती हैं, जिससे मेगालोब्लास्टिक एनीमिया हो जाता है। इससे शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है, जिससे थकान, साँस लेने में तकलीफ, त्वचा का पीला पड़ना और तेज़ दिल की धड़कन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। समय पर इलाज न होने पर यह स्थिति गंभीर हो सकती है।
न्यूरोपैथी
B12 न्यूरॉन्स के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसकी कमी से झुनझुनी, सुन्नता, हाथों और पैरों में तेज चुभन, संतुलन बिगड़ना और चलने में कठिनाई जैसी समस्याएं होती हैं। इस स्थिति को 'न्यूरोपैथी' कहा जाता है और लंबे समय तक B12 की कमी से स्थायी तंत्रिका क्षति हो सकती है। यह विशेष रूप से बुजुर्गों में आम है।
कमजोर याददाश्त
B12 की कमी से मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे याददाश्त कमजोर हो जाती है। व्यक्ति चीजें भूलने लगता है, भ्रमित हो जाता है और निर्णय लेने में परेशानी होती है। लंबे समय में, यह स्थिति, खासकर बुजुर्गों में, डिमेंशिया जैसी गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकती है।
अवसाद
विटामिन बी12 मस्तिष्क में सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे "खुशी के हार्मोन" के उत्पादन में मदद करता है। इसकी कमी से व्यक्ति उदास रहने लगता है, मनोदशा में उतार-चढ़ाव आते हैं और अवसाद की स्थिति विकसित हो सकती है। अनिद्रा, चिंता और मन में निराशा जैसे लक्षण आम हो जाते हैं।
अत्यधिक थकान और कमजोरी
विटामिन बी12 की कमी से शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं मिल पाती, जिससे लगातार थकान बनी रहती है। बिना मेहनत किए भी शरीर भारी लगता है, छोटी-छोटी गतिविधियाँ भी मुश्किल हो जाती हैं। मांसपेशियों में कमजोरी, चक्कर आना और सिरदर्द जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।
सांस फूलना और चक्कर आना
विटामिन बी12 की कमी से ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है। सांस फूलना खासकर सीढ़ियाँ चढ़ते या हल्का शारीरिक श्रम करते समय होता है। चक्कर आना, सिर चकराना और बेहोशी जैसा महसूस होना इसके साथ आम है।
मुँह और जीभ की समस्याएँ
विटामिन B12 की कमी से मुँह के छाले, जीभ में सूजन, जलन और लालिमा हो सकती है। इस स्थिति को "ग्लोसाइटिस" कहते हैं। जीभ अपनी चिकनाई खो देती है और स्वाद की अनुभूति कम हो जाती है। मुँह के कोनों में दरार पड़ना और खाने-पीने में भी कठिनाई हो सकती है।
दृष्टि संबंधी समस्याएँ
विटामिन B12 की कमी से ऑप्टिक तंत्रिका प्रभावित हो सकती है, जिससे धुंधली दृष्टि, दोहरी छवि या आँखों में जलन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। इसे "ऑप्टिक न्यूरोपैथी" कहते हैं। अगर समय पर इलाज न किया जाए, तो यह स्थिति अंधेपन का कारण बन सकती है।
बांझपन
लंबे समय तक विटामिन B12 की कमी पुरुषों और महिलाओं दोनों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। महिलाओं को अनियमित मासिक धर्म और गर्भधारण में कठिनाई हो सकती है, जबकि पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम हो सकती है। समय पर इलाज करने पर यह प्रभाव कभी-कभी ठीक हो जाता है।
हृदय रोग
विटामिन B12 की कमी से शरीर में होमोसिस्टीन नामक अमीनो एसिड का स्तर बढ़ जाता है, जो रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुँचाता है। इससे हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। विटामिन बी12 हृदय स्वास्थ्य के लिए एक आवश्यक विटामिन है, जो हृदय को मजबूत और धमनियों को साफ रखता है।